Crop Production and Management in Hindi – फसल उत्पादन और प्रबंधन

भारत हमेशा से एक कृषि प्रधान देश रहा है और आने वाले समय में भी भारत की कृषि पर निर्भरता कम नहीं होने वाली है । भारत में कृषि संबंधित कोर्स भी इसलिए ही चलाए जा रहे हैं ताकि लोग उन्नत कृषि की ओर आगे बढ़ें और व्यवसाय की दृष्टिकोण से Crop Production और Management करें ।

अगर आप एक छात्र हैं और फसल उत्पादन व प्रबंधन एक स्कूल सिलेबस का हिस्सा रहा है, तो आपको यह आर्टिकल जरूर पढ़ना चाहिए । इसके अलावा कृषि में रुचि रखने वाला कोई भी व्यक्ति इस लेख से महत्वपूर्ण जानकारियां ले सकता है । तो चलिए Crop Production and Management विषय पर विस्तार से जानकारी प्राप्त करते हैं ।

Crop Production क्या है ?

फसल उत्पादन घरेलू और व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए फसल उगाने की प्रक्रिया है । बड़े पैमाने पर उत्पादित कुछ फसलों में चावल, गेहूं, मक्का, जूट आदि शामिल हैं । फसल उगाने की प्रक्रिया में निम्नलिखित चीजें शामिल होती हैं:

  • मिट्टी की तैयारी
  • बीज बोना
  • खाद और उर्वरकों का छिड़काव
  • सिंचाई
  • खरपतवारों से बचाव
  • फसल की कटाई

मिट्टी की तैयारी से लेकर फसल की कटाई तक पूरी प्रक्रिया का पालन करके ही फसल उत्पादन किया जाता है । अगर आप गांवों में रहे हैं और फसल उत्पादन की प्रक्रिया को थोड़ा बहुत भी देखा समझा है तो आपके लिए सारी चीजें समझना ज्यादा आसान होगा । चलिए विस्तार से जानते हैं कि Crop Production के अंतर्गत क्या क्या आता है ।

1. मिट्टी की तैयारी

कृषि की नींव मिट्टी है । विशेष पर्यावरणीय परिस्थितियों में, मिट्टी का निर्माण भौतिक, रासायनिक और जैविक प्रक्रियाओं के संयोजन का परिणाम है । मिट्टी खनिजों, कार्बनिक पदार्थों, जल, वायु आदि का एक जटिल मिश्रण है और पृथ्वी पर जीवन का समर्थन करती है । फसल उत्पादन से पहले मिट्टी की तैयारी कुछ इस प्रकार की जाती है कि वह फसल उत्पादन के लायक बन सके ।

मिट्टी की तैयारी में विभिन्न प्रकार के उपकरणों का उपयोग करना शामिल है, जैसे कि कुदाल, हल, कल्टीवेटर आदि । इन उपकरणों की मदद मिट्टी की खुदाई करके उन्हें फसल उत्पादन के लायक बनाने का कार्य किया जाता है । उच्च पैदावार और गुणवत्ता वाली फसलों के उत्पादन के लिए मिट्टी तैयार करने के लिए जुताई, समतल करना और खाद डालना आदि किया जाता है ।

1. जुताई

Crop Production यानि फसल उत्पादन के लिए सबसे पहले मिट्टी की जुताई की जाती है । जमीन की जुताई से पहले सूखी जमीन में पानी देना चाहिए । भूमि की सिंचाई करने से अवांछित पौधों की जड़ों को ढीला करने में मदद मिलती है, जिन्हें मिट्टी की तैयारी के दौरान आसानी से हटाया जा सकता है ।

जुताई मिट्टी की तैयारी में पहला और सबसे महत्वपूर्ण कदम है । जुताई मिट्टी को भुरभुरा बनाने और ढीला करने की प्रक्रिया है । प्राचीन समय में जुताई का कार्य बैलों के माध्यम से किया जाता था जिसके लिए लड़की से बने हल इस्तेमाल में लाए जाते थे । लेकिन वर्तमान समय में ट्रैक्टर के माध्यम से ही खेतों की जुताई का कार्य होता है ।

2. मिट्टी को समतल करना

खेत की जुताई के पश्चात मिट्टी को समतल करना महत्वपूर्ण होता है । जुताई के पश्चात मिट्टी ऊबड़ खाबड़ हो जाती है जिसे समतल करना जरूरी होता है । सिंचाई के दौरान खेतों में पानी का समान वितरण हो, इसके लिए मिट्टी को समतल किया जाता है ।

मिट्टी के बड़े बड़े टुकड़ों को तोड़ने के लिए तख़्त या लोहे के लेवलर की मदद ली जाती है । यह कार्य भी वर्तमान समय में ट्रैक्टर की ही मदद से किया जाता है । मिट्टी को समतल करने से खरपतवार नियंत्रण में भी मदद मिलती है ।

3. खाद देना

Crop Production की प्रक्रिया में खाद का महत्वपूर्ण स्थान है । कृषि भूमि को खाद देने से मिट्टी की उर्वरता और फसल की उपज में वृद्धि होती है । इसके साथ ही खाद मिट्टी की बनावट को उन्नत करती है, नाइट्रोजन का पुनर्चक्रण करती है और आवश्यक बैक्टीरिया का मिट्टी में मिलावट करती है ।

पौधे की वृद्धि के लिए खाद बहुत ही महत्वपूर्ण होते हैं । कभी-कभी, जुताई से पहले मिट्टी में खाद डाल दी जाती है ताकि मिट्टी की उर्वरकता बढ़ सके और खरपतवार पर काबू पाया जा सके । खाद भी दो प्रकार के होते हैं:

  • जैविक खाद
  • रासायनिक खाद

रासायनिक खाद के अधिकाधिक प्रयोग से मिट्टी की उर्वरकता में कमी आती है और खाद्य श्रृंखला को भी प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से नुकसान पहुंचता है । जबकि जैविक खाद फसलों की उर्वरकता को बढ़ाता है और इसकी वजह से फसलों को कोई नुकसान नहीं होता है । हालांकि जैविक खेती में कम उत्पादन क्षमता होती है ।

2. बीज बोना

Crop Production यानि फसल उत्पादन की प्रक्रिया में दूसरा महत्वपूर्ण कार्य है बीज बोना । अच्छी गुणवत्ता वाले, संक्रमण मुक्त बीजों को एकत्र कर तैयार भूमि पर बोया जाता है । बीजों को उचित गहराई और उचित दूरी पर बोन से उत्पादक क्षमता में वृद्धि होती है ।

फसलों को बोने के मुख्य रूप से दो तरीके हैं । चलिए इन तीनों के बारे में संक्षेप में आसान भाषा में समझते हैं ।

1. हाथ की बुवाई

भारत में बड़े पैमाने पर हाथ से ही पौधों की बुवाई की जाती है । बुवाई करने से पहले उन्हें अत्यधिक उर्वर भूमि में बड़ी ही सावधानी से तैयार किया जाता है । हाथ से फसलों की बुवाई करने के लिए कुशल लोगों की आवश्यकता पड़ती है जो बुवाई के बारे में अच्छे से समझते हैं ।

बीज को आम तौर पर बीज के आकार के लगभग 2-3 गुना की गहराई को बनाए रखते हुए मिट्टी में बोया जाना फायदेमंद होता है । हाथों से बीजों या पौधों की बुवाई के लिए कई कुशल लोगों की आवश्यकता होती है ।

2. बीज ड्रिल

भारत के कई हिस्सों में अब हाथ से बुवाई करने के बजाय बीज ड्रिल का इस्तेमाल किया जाने लगा है । ये ज्यादा सटीक होते हैं और एक निश्चित गहराई तक बीज को बोने का काम करते हैं । फसल की प्रजातियों और बढ़ती परिस्थितियों के आधार पर पंक्तियाँ आम तौर पर लगभग 10-30 सेमी अलग होती हैं । इसके हिसाब से ही ड्रिल मशीन बुवाई करती है ।

हाथ की बुवाई के मुकाबले यह काफी कम समय लेता है हालांकि इसके लिए किसानों को ज्यादा रुपए खर्च करने की जरूरत पड़ती होगी ।

3. खाद और उर्वरकों का छिड़काव

पौधे की वृद्धि को कुशलतापूर्वक बनाए रखने के लिए मिट्टी में सही पोषक तत्व नहीं हो सकते हैं । इसलिए, मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने और पौधों को बेहतर तरीके से विकसित करने में मदद करने के लिए खाद और उर्वरकों को मिट्टी में मिलाया जाता है । यह Crop Production के लिए काफी महत्वपूर्ण होता है ।

गड्ढों में सड़ने वाले पौधे और पशु पदार्थ का उपयोग करके खाद तैयार की जाती है । दूसरी ओर, उर्वरक कारखानों में तैयार किए जाने वाले रसायन होते हैं जिनमें एक विशिष्ट पौधे के लिए पोषक तत्व होते हैं हालांकि इनका अनुचित इस्तेमाल पर्यावरण के लिए हानिकारक होता है ।

हालांकि अब किसानों के लाए नीम लेपित यूरिया उपलब्ध कराया जा रहा है जिसके इस्तेमाल से मृदा संरक्षण और फसल उत्पादन दोनों में मदद मिलती है । खाद और उर्वरकों का इस्तेमाल बुवाई से पहले और बुवाई के बाद भी किया जाता है ।

4. सिंचाई

फसलों को उचित वृद्धि के लिए नियमित अंतराल पर पानी की आवश्यकता होती है । पौधों को पानी की आपूर्ति को सिंचाई के रूप में जाना जाता है । सिंचाई ट्यूबों, पंपों और स्प्रे की विभिन्न प्रणालियों के माध्यम से मिट्टी में पानी का कृत्रिम अनुप्रयोग है । सिंचाई का उपयोग आमतौर पर उन क्षेत्रों में किया जाता है जहां वर्षा अनियमित होती है या मौसम शुष्क होता है ।

सिंचाई से कृषि फसलों को उगाने, परिदृश्य को बनाए रखने और शुष्क क्षेत्रों में और औसत से कम वर्षा की अवधि के दौरान मिट्टी को फिर से जीवंत करने में मदद मिलती है । फसल उत्पादन में सिंचाई के अन्य उपयोग भी हैं, जिसमें ठंढ से सुरक्षा, अनाज के खेतों में खरपतवार की वृद्धि को रोकना और मिट्टी के समेकन को रोकना शामिल है ।

बात करें अगर सिंचाई के आधुनिक तरीकों की तो यह कुल 2 प्रकार का होता है । चलिए संक्षेप में इन दोनों प्रकारों के बारे में समझते हैं:

1. छिड़काव प्रणाली

स्प्रिंकलर (छिड़काव) सिंचाई प्रणाली एक पंप की मदद से उच्च दबाव में पानी के इस्तेमाल में सहायता करती है । यह पाइपों में रखे एक छोटे व्यास के नोजल के माध्यम से वर्षा के समान पानी छोड़ता है । इसका उदाहरण आप नीचे दिए तस्वीर में देख सकते हैं, आमतौर पर इस प्रणाली का इस्तेमाल बागवानी में होता है ।

Sprinkling system of irrigation
Source: Pixabay.com

यह प्रणाली जल संरक्षण में मदद करता है और साथ ही उपज बढ़ाने में मदद करता है । इसके साथ ही छिड़काव विधि से सिंचाई का फायदा यह भी है कि मिट्टी के संघनन को कम करता है और श्रम लागत को कम करता है ।

2. टपक सिंचाई प्रणाली

Dripping system of irrigation
Source: SSWM.info

Crop Production के लिए अक्सर ड्रिप (टपक सिंचाई) प्रणाली का भी इस्तेमाल सिंचाई के लिए किया जाता है । यह पानी की बर्बादी को रोकता है और ज्यादा क्षेत्र में सिंचाई को संभव बनाता है । ड्रिप प्रणाली में, पानी की आपूर्ति एक नली या पाइप का उपयोग करके जड़ों में बूंद-बूंद करके की जाती है ।

इस पद्धति का उपयोग उन क्षेत्रों में भी किया जा सकता है जहाँ पानी की उपलब्धता कम है । इसका इस्तेमाल भी बागवानी की सिंचाई में अक्सर किया जाता है । हालांकि इस प्रणाली के स्थापना में ज्यादा खर्च आता है ।

5. खरपतवारों से बचाव

खरपतवार को फसल के खेतों में अवांछित पौधों के रूप में परिभाषित किया जाता है जो मुख्य फसल के साथ उगते हैं । वे फसलों के विकास में बाधा बनते हैं इसलिए इनसे बचाव करना जरूरी होता है । Crop Production यानि फसल उत्पादन की प्रक्रिया में खरपतवारों को कई बार नष्ट करने की आवश्यकता पड़ती है ।

निराई-गुड़ाई खेत से खरपतवारों को हटाना है । यह फसल सुरक्षा और फसल उत्पादन प्रबंधन की एक प्रभावी पूर्व-कटाई विधि है । खरपतवारों को कई तरह से नियंत्रित किया जा सकता है । खरपतवार प्रबंधन में भूमि की तैयारी, जल प्रबंधन, हाथ से निराई, फसल चक्रण और कीटनाशक शामिल हैं ।

खरपतवार प्रकृति के लिए फायदेमंद होते हैं लेकिन यह फसल को खराब कर देते हैं । इस प्रकार, जीवित प्राणियों पर उनके प्रभाव को रोकने के लिए खरपतवारों को नियंत्रित करने की आवश्यकता है ।

6. फसल की कटाई

कटाई खेतों से पकी फसल को इकट्ठा करने की प्रक्रिया है । कटाई के लिए दरांती या काटनेवाला अन्य उपकरणों की मदद ली जाती है । यह आमतौर पर लोगों द्वारा किया जाता है, जो दरांती की मदद से फसलें काटते हैं । यह Crop Production के लिए अहम पड़ाव है ।

हालाँकि, इन दिनों यांत्रिक कटाई का उपयोग किया जाता है । Crop Production का यह अंतिम चरण होता है । वर्तमान समय में यांत्रिक कटाई का दौर है और मशीनों की मदद से बड़े पैमाने पर कटाई की जाती है । कटाई का पूरा होना बढ़ते मौसम के अंत, या किसी विशेष फसल के लिए बढ़ते चक्र का प्रतीक है । इसके अंतर्गत दो दो चीजें मुख्य रूप से आती हैं:

1. थ्रेशिंग

फसल की कटाई के उपरांत उसकी थ्रेशिंग की जाती है । कटी हुई फसलों से अनाज को अलग करना थ्रेसिंग कहलाता है । यह या तो मशीनों या मवेशियों द्वारा किया जाता है । गांवों में अभी भी मवेशियों जैसे बैलों या भैंसों की मदद से थ्रेशिंग की जाती है ।

2. पछोरना या फटकना

फसलों की कटाई के बाद Winnowing की जाती है जिसे आप पछोरना या फटकना कह सकते हैं । अनाज और भूसी को अलग करना विनोइंग कहलाता है । यह या तो मशीनों की मदद से या मैन्युअल रूप से किया जाता है ।

Crop Management in Hindi

Crop Production यानि फसल उत्पादन के बाद Crop Management यानि फसल प्रबंधन आता है । जिस प्रकार फसल उत्पादन कृषि में बहुत महत्वपूर्ण है ठीक उसी प्रकार फसलों का सही ढंग से प्रबंधन भी महत्वपूर्ण होता है । फसल प्रबंधन फसलों की वृद्धि, विकास और उपज में सुधार के लिए की जाने वाली कृषि पद्धतियों का समूह है ।

इसकी शुरुआत बीज की क्यारी तैयार करने, बीज बोने और फसल के रख-रखाव से होती है और फसल की कटाई, भंडारण और विपणन के साथ समाप्त होता है । इसमें सबसे महत्वपूर्ण भंडारण होता है जिसके बारे में विस्तृत जानकारी आप पढ़ सकते हैं ।

1. भंडारण

यदि अनाज को अधिक समय तक रखना है तो उसका भण्डारण ठीक प्रकार से करना चाहिए । फसलों के उत्पादन के बाद उसका भंडारण करना इसलिए भी जरूरी हो जाता है क्योंकि वर्तमान समय अनिश्चितताओं से भरा पड़ा है । रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध ने पूरी दुनिया में अनिश्चितता भर दी है और खाद्य पदार्थों को कमी को महसूस किया जा सकता है ।

भंडारण के लिए सबसे पहले अनाज को धूप में सुखाना जरूरी होता है । इसके बाद उनमें नीम या अन्य उर्वरक मिलाए जाते हैं ताकि वे खराब न हों और लंबे समय तक खाने के योग्य बने रहें । उन्हें कीटों और नमी से बचाने की जरूरत है । ताजा कटे हुए बीजों को संग्रहित करने से पहले सुखा लेना चाहिए । यह सूक्ष्मजीवों और कीटों के हमले को रोकता है ।

काटा और अलग किया हुआ अनाज वायुरोधी धातु के डिब्बे में या जूट की थैलियों में रखा जाता है । घर में नुकसान से बचाने के लिए इसमें सूखे नीम के पत्ते डाले जाते हैं । कीटों और कीड़ों से बचाने के लिए, बड़ी मात्रा में अनाज को विशिष्ट रासायनिक उपचारों के साथ अन्न भंडार में संग्रहित किया जाता है ।

Conclusion

Crop Production and Management के इस लेख में आपने फसल उत्पादन और प्रबंधन से सम्बन्धित महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त की । अगर आप एक छात्र हैं और कृषि विज्ञान की पढ़ाई करना चाहते हैं या कृषि संबंधित नोट्स तैयार करना चाहते हैं तो ऊपर दी गई जानकारी आपके काम की है ।

हमें उम्मीद है कि आपको Crop Production and Management पर दी गई जानकारी पसंद आई होगी । अगर आपके मन में विषय से संबंधित कोई भी प्रश्न है तो आप नीचे कमेंट करके पूछ सकते हैं । इसके साथ ही अगर आपको यह आर्टिकल पसंद आया हो तो इसे शेयर जरूर करें ।

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