वैश्वीकरण क्या है – वैश्वीकरण के आयाम, फायदे, नुकसान और इतिहास

वर्तमान समय में पूरा विश्व एक गांव की तरह बन गया है जहां दुनिया के विभिन्न देश एक दूसरे से कई प्रकार के लेन देन करते हैं । यह लेनदेन विचार, ज्ञान, सूचना, सामान और सेवाएं आदि का होता है । वैश्वीकरण एक बहुआयामी प्रक्रिया है जोकि हैं आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक । हालांकि आर्थिक क्षेत्र में इसका महत्व सामाजिक और सांस्कृतिक से कहीं ज्यादा है । दुनिया के सभी देश या भूभाग किसी न किसी रूप के एक दूसरे से जुड़े हैं ।

हाल के उदाहरण की बात करें तो वैश्विक महामारी कोरोनावायरस ने दुनिया को एक बड़े संकट में डाल दिया था । दुनिया के विकसित और सबसे शक्तिशाली देशों की स्थितियां भी डावांडोल हो गईं थी । ऐसी परिस्थिति में दुनिया के सभी देशों ने मिलकर इस महामारी के खिलाफ लड़ाई लड़ी और काफी हद तक इसपर जीत भी हासिल की जा चुकी है ।

भारत से ही अन्य कई देशों को वैक्सीन, दवाइयां और अन्य उपकरण भेजे गए जो वैश्वीकरण (globalisation) का एक सर्वोत्तम उदाहरण है । चलिए विस्तार से समझते हैं कि Vaishvikaran kya hai

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वैश्वीकरण क्या है ?

वैश्वीकरण क्या है

वैश्वीकरण शब्द दो शब्दों विश्व और एकीकरण से मिलकर बना है जिसका अर्थ है कि पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था को एकीकृत करना है और उन्हें एक ही छत के नीचे लाना है । इसका मुख्य मकसद देशों के बीच आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक दूरियों को दूर करना है । वैश्वीकरण के पीछे की कामना पूरे विश्व को एक बनाना है ।

इसे एक आसान से उदाहरण के माध्यम से समझते हैं । हम रोजमर्रा के जीवन में न जाने कितने ही वस्तुओं और सेवाओं का उपभोग करते हैं लेकिन आप भी यह जानते हैं कि वे सभी वस्तुएं/सेवाएं जरूरी नहीं कि भारत देश में निर्मित की गई हों । यानि अमेरिका, जापान, चीन में बनें वस्तुओं का उपभोग भारत में बड़े पैमाने पर हो रहा है और यही वैश्वीकरण है । यह उदाहरण भूमंडलीकरण के आर्थिक आयाम दिखाता है ।

यानि कि विश्व के सभी देश अपनी वस्तुओं और सेवाओं का आदान प्रदान अन्य देशों में सुगमता से कर पा रहे हैं । इससे दोनों देशों को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से फायदा मिलता है । भारत में अगर जापान में बनी वस्तुएं बिक रही हैं तो इससे जापान और भारत दोनों को आर्थिक रूप से फायदे मिल रहे हैं ।

वैश्वीकरण की परिभाषा एवं अन्य नाम

वैश्वीकरण की परिभाषा कई विद्वानों ने दी है, लेकिन अगर हम उन सभी परिभाषाओं का निचोड़ निकालें तो पता चलता है कि इसका अर्थ भौगोलिक सीमाओं के परे जाकर सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक आयामों का विकास करना ही है । आइए एक नजर डालते हैं वैश्वीकरण की परिभाषा पर:

1. टॉम जी पामर: “सीमाओं के पार विनिमय पर राज्य प्रतिबन्धों का ह्रास या विलोपन और इसके परिणामस्वरूप उत्पन्न हुआ उत्पादन और विनिमय का तीव्र एकीकृत और जटिल विश्व स्तरीय तन्त्र ।”

2. विश्व स्वास्थ्य संगठन: “लोगों और देशों की बढ़ी हुई अंतर्संबंधता और अन्योन्याश्रयता ।”

3. ऐ. के. अब्दल रषीद: “यह मानवीय इच्छाओं को सावरलौकिकक बनाकर सीमा के बाहर लाने का श्रम है । इस सीमा से तात्पर्य भौतिक सीमा से है। इससे संसार भर के लोगों को समानता का अवसर मिलेगा और आर्थिक दृष्टि से सभी समान हों ।”

4. डॉ. भूपेन्द्रराय चौधरी: “अब भूमंड़लीकरण का अर्थ है सारी दुनिया को एक ही रंग में रंगना । स्पष्ट रूप मे कहा जाए तो अमेरिकी संस्कृति और जीवन शैली को सारे संसार पर लादना ।

5. सी. बी. सुधिाकरन: “आज जब स्वतन्त्र व्यापार की बात होती है उसका एकमात्र अर्थ होता है सशक्त व्यापारिक संस्थाओं के लिए उन सारे क्षेत्रों को खोल देना जो अब तक इनकी पहुँच के बाहर है । शोषण का नया ढाँचा है वैश्वीकरण ।

समाज वैश्वीकरण के फायदे और नुकसान पर बंटा हुआ है । इसके महत्व से ज्यादा लोग इसके नकारात्मक पक्ष को ज्यादा उभारते हैं । हालांकि इसके जहां कई फायदे हैं और इसके कई नुकसान भी हैं, जिन्हें नजरंदाज नहीं किया जा सकता है । वैश्वीकरण को भूमंडलीकरण, ग्लोबलाइजेशन, अन्तरराष्ट्रीयकरण भी कहा जाता है । अंग्रेजी में इसे globalisation कहा जाता है ।

वैश्वीकरण का इतिहास

कई लोगों का ऐसा मानना है कि वैश्वीकरण की शुरुआत वर्ष 1990 से हुआ लेकिन ऐसा कहना पूरी तरह गलत होगा । जब हम वैश्वीकरण के इतिहास पर नजर डालते हैं तो पता चलता है कि यह प्राचीन समय से ही चला आ रहा है । माना जाता है कि मनुष्य की उत्पत्ति और विकास से ही इसकी शुरुआत हो गई थी हालांकि इसका कोई पुख्ता प्रमाण अभी उपलब्ध नहीं है । लेकिन दुनिया की प्राचीन सभ्यताओं की खोज और अध्ययन से पता चलता है कि उनके बीच व्यापार होता था ।

उदाहरण के तौर पर सिंधु घाटी सभ्यता और मेसोपोटामिया की सभ्यता के बीच व्यापार संबंधों के साक्ष्य देखने को मिलते हैं । अगर हम थोड़ा आगे आते हैं तो इसका एक रूप हमें मौर्य साम्राज्य, गुप्त साम्राज्य, रोमन साम्राज्य, हान राजवंश, मंगोल साम्राज्य आदि में भी देखने को मिलता है । लेकिन इसका रूप संकुचित था और बड़े पैमाने पर यह दिखलाई नहीं पड़ता है ।

इसका व्यापक स्वरूप 16वीं शताब्दी से देखने को मिलता है जब पुर्तगाल का वैश्विक विस्तार शुरू हुआ । पुर्तगालियों ने अफ्रीका और भारत के साथ विस्तार और व्यापार किया जो वैश्वीकरण का पहला प्रमुख व्यापारिक रूप था । इसके बाद ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना के बाद से आर्थिक वैश्वीकरण में बड़ा उछाल देखने को मिला । इसके अलावा दो विश्वयुद्धों ने भी भूमंडलीकरण का रास्ता प्रशस्त किया ।

वैश्वीकरण के आयाम

वैश्वीकरण के मुख्य रूप से 4 आयाम हैं:

  • आर्थिक आयाम
  • राजनीतिक आयाम
  • सामाजिक आयाम
  • सांस्कृतिक आयाम

इन तीनों में सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक आयाम है जो वैश्वीकरण का एक मुख्य उद्देश्य भी है । अगर ध्यान दिया जाए तो दुनिया के सभी देश मुख्य रूप से आर्थिक उद्देश्यों और हितों को पूर्ण करने के लिए ही एक दूसरे से जुड़े हुए हैं । हालांकि इसके अन्य तीनों आयामों को नजरंदाज करना भी अनुचित होगा जो कमोबेश वैश्वीकरण के महत्वपूर्ण पहलू हैं । इनके बारे में विस्तार से समझते हैं ।

1. वैश्वीकरण के आर्थिक आयाम

वैश्वीकरण के आर्थिक पहलू को सही ढंग से परिभाषित नहीं किया जा सका है । आर्थिक वैश्वीकरण का सीधा अर्थ अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व व्यापार संगठन जैसी अंतरराष्ट्रीय संगठनों और तथा विश्व भर में आर्थिक नीतियों के निर्धारण में इनके द्वारा निभाई जाने वाली भूमिका पर जाता है । इसे संकुचित करना अनुचित होगा । बल्कि इसके अंतर्गत राष्ट्रीय आर्थिक अवरोधों का दूर होना, व्यापार एवं सेवाओं का मुक्त प्रवाह, निवेश में उदारीकरण, विदेशी सीधा निवेश आदि सम्मिलित है ।

आर्थिक आयाम के अंतर्गत आने वाले मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

1. निजीकरण

आप रोज टेलीविजन पर privatisation यानि निजीकरण की खबरें सुनते होंगे । लेकिन इसकी शुरुआत इंग्लैंड और अमेरिका से हुई थी जहां उधोगों और सेवाओं के निजीकरण की वकालत की गई । निजीकरण का सामान्य अर्थ सार्वजनिक संपत्तियों (सरकारी) को निजी स्वामित्वों के हाथों बेचना । इसके पीछे का उद्देश्य व्यवसाय को वैश्विक अर्थव्यवस्था की चुनौतियो का सामना करने और अधिक कुशल बनाने के लिए किया गया ।

भारत में भी नब्बे के दशक में निजीकरण से जुड़े महत्वपूर्ण कदम उठाए गए और सार्वजनिक संपत्तियों का निजीकरण किया गया । इसके साथ ही लाइसेंस राज को खत्म करना, सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों में विनिवेश आदि शामिल था । ये सभी कदम वैश्विक अर्थव्यवस्था को ध्यान में रखकर किया गया जोकि वैश्वीकरण के आर्थिक आयामों का एक पहलू है ।

2. उदारीकरण

उदारीकरण को अंग्रेजी में liberalization कहा जाता है । इसका सामान्य अर्थ यह होता है सामाजिक तथा आर्थिक नीति के क्षेत्रों में प्रतिबंधों में छूट । इसका उद्देश्य सरकारों को व्यापार आदि कार्यों में भूमिका को घटाना और बाजारों को सबके लिए खोलना । देश की सरकारें आर्थिक क्षेत्रों से हाथ खींच लेती हैं और उन क्षेत्रों पर सरकार के नियंत्रण को सीमित किया जाता है । पहले के समय में अगर एक देश किसी अन्य देश में व्यापार करना चाहता था तो कई प्रकार के प्रतिबंध लगाए जाते थे ।

इसके अलावा उन्हें देश में सीधे निवेश की छूट नहीं दी जाती थी । लेकिन पश्चिमी देशों से उदारीकरण की शुरुआत हुई जिसका उद्देश्य आर्थिक गतिविधियों पर सरकार का सीमित नियंत्रण और निजी स्वामित्व को बढ़ावा देना था । भारत में भी नब्बे के दशक में LPG यानि Liberalisation, Privatisation और Globalisation की संकल्पना को मूर्त रूप दिया गया ।

3. विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI)

एक विदेशी प्रत्यक्ष निवेश एक देश में एक व्यवसाय में दूसरे देश में स्थित एक इकाई द्वारा नियंत्रित स्वामित्व के रूप में एक निवेश है । यानि कि भारत के किसी व्यवसाय में किसी अन्य देश के व्यवसाय द्वारा निवेश जो आर्थिक वैश्वीकरण का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है । इससे देश की आर्थिक स्थिति मजबूत होती है और विकास कार्य तेज गति से संपन्न होते हैं ।

भारतीय कंपनियों ने भी अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर खिलाड़ी की भूमिका निभाई है । इसलिए यह सिर्फ एक तरफा नहीं होता है बल्कि दो तरफा होता है । इस तरह सेवाएं और उत्पादों के साथ साथ मुद्रा को भी वैश्वीकरण की परिधि में आसानी से लाया जाता है ।

2. वैश्वीकरण के सामाजिक आयाम

वैश्वीकरण के आर्थिक आयाम के बाद सामाजिक आयाम पर भी एक नजर डालते हैं । अक्सर लोग भूमंडलीकरण के सिर्फ आर्थिक मायने ही निकालते हैं और इसके सामाजिक आयाम को खारिज करते हैं लेकिन यह अनदेखी ही कही जा सकती है । भूमंडलीकरण न सिर्फ आर्थिक बल्कि समाज/देश के सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों पर भी अपनी छाप छोड़ता है ।

कुछ सामाजिक आयाम इस प्रकार हैं: परिवारों एवं समुदायों की सुरक्षा, संस्कृति एवं पहचान, सम्मिलित अथवा बहिष्कृत तथा संबद्धता का भाव । चलिए कुछ वैश्वीकरण के सामाजिक आयामों पर नजर डालते हैं ।

1. श्रम सुधार और श्रम कल्याण

वैश्वीकरण का सबसे बड़ा सामाजिक प्रभाव श्रम सुधार और श्रम कल्याण की दिशा में हुआ है । इसकी वजह से श्रम संबंधित विभिन्न नीतियों और कानूनों में महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिले हैं । सार्वजनिक क्षेत्र वेतन एवं रोजगार नीतियों, न्यूनतम वेतन निर्धारण एवं रोजगार सुरक्षा नियम आदि उपायों के माध्यम से सुधार किए गया और निरंतर किए जा रहे हैं । लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि इसकी वजह से श्रमिकों के वेतन कम हो रहे हैं ।

वैश्वीकरण की इस आंधी में अब उत्पादकों के पास विकल्पों की बाढ़ आ गई है और इस वजह से श्रमिकों के वेतन में गिरावट देखी जा रही है । हालांकि एक सकारात्मक पहलू यह है कि इससे रोजगार के अवसरों में भी वृद्धि देखी गई है । लेकिन साथ ही नई तकनीकों के आने से कुछ क्षेत्रों में बेरोजगारी के बढ़ने की चिंता भी दिनोदिन बढ़ती ही जा रही है । वर्तमान समय में इसका सबसे बड़ा उदाहरण दिवाली पर्व को ले सकते हैं जिस दिन चीनी सामानों और दियों की खरीद ज्यादा हो रही है और भारत में बन रहे मिट्टी की दियों की खरीददारी में लगातार गिरावट देखी जा रही है ।

2. प्रवसन और शहरीकरण

आर्थिक वैश्वीकरण की वजह से सामाजिक क्षेत्र पर काफी असर पड़ा है । हालांकि पहले भी लोग बेहतर रोजगार और श्रम मूल्य की तलाश में अपने देश/समाज की भौगोलिक सीमा लांघते थे लेकिन भूमंडलीकरण के बाद से इसमें तीव्रता देखी गई है । प्रवसन अधिकतर ग्रामीण क्षेत्रों से होता है और शहरों की तरफ भागता है जिसके कई लाभ तो कई हानियां भी हैं ।

इसका मुख्य कारण वैश्वीकरण ही है जो शहरीकरण को बढ़ावा देने का कार्य करता है । इसके साथ ही बेहतर रोजगार और रुपयों के लिए हजारों की मात्रा में मजदूर दूसरे देशों में भी जाते हैं । भारत से किसी अन्य देश में जाकर श्रम करने का उद्देश्य बेहतर जीवन यापन और ज्यादा वेतनमान ही होता है ।

3. गरीबी

ऐसा माना जाता है कि वैश्वीकरण ने गरीबी को कम करने का कार्य किया है लेकिन कई ऐसे क्षेत्र हैं, खासकर कि खाद्यान्न उत्पादन, जिसमें गरीबी बढ़ी है । कृषि वैश्वीकरण ने स्थानीय कृषि को बर्बाद करने के साथ ही मुख्य निर्धारण को भी असामान्य बनाया है । आर्थिक उदारीकरण से न सिर्फ ग्रामिक बल्कि शहरी गरीबी में भी बढ़ोत्तरी देखने को मिली है । सामाजिक क्षेत्र व्यय में गिरावट अथवा सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात में सामाजिक क्षेत्र व्यय में गतिहीनता भी गरीबों के विरुद्ध हो गए ।

भूमंडलीकरण के सांस्कृतिक आयाम

वैश्वीकरण का हमारे रहन सहन, संस्कृति और परंपराओं पर भी गहरा प्रभाव पड़ा है । वैश्वीकरण की झलक हमारे जीवन के हर एक हिस्से, हर एक सेकंड में देखी जा सकती है । हमारा पहनावा, खान पान, रहन सहन आदि सबकुछ उससे प्रभावित है । हम भावनात्मक रूप से अपनी मातृभाषा से जुड़े होते हैं लेकिन भूमंडलीकरण ने हमारी भाषा में भी हस्तक्षेप और मिलावट करने का प्रयास किया है ।

Globalisation के सांस्कृतिक आयामों पर दृष्टि डालें तो इसके कुछ सकारात्मक प्रभाव भी देखने को मिलते हैं और कुछ नकारात्मक प्रभाव भी । चलिए इसके बारे में समझते हैं ।

1. सांस्कृतिक हस्तक्षेप

वैश्वीकरण की वजह से सांस्कृतिक हस्तक्षेप में तीव्र गति से वृद्धि हुई है । इसकी वजह से सांस्कृतिक गतिवाद बढ़ा है और इसमें नित नए परिवर्तन भी आ रहे हैं । जहां व्यापार का लेन देन प्रचुर मात्रा में होता है वहां गतिवाद अपने चरम सीमा पर होता है । सांस्कृतिक हस्तक्षेप वस्तु विनिमय के माध्यम से आज इतना व्यापक है कि मौलिक और आयातित गुणों के बीच भेद करना असम्भव नहीं तो कम से कम मुश्किल अवश्य हो गया है ।

कुछ ही दिन पहले खबर आई कि अब आप गंगा आरती और भारत की अन्य महत्वपूर्ण आरती और भगवान दर्शन ऑनलाइन कर सकते हैं । इससे आप समझ सकते हैं कि भारतीय संस्कृति में भूमंडलीकरण का कितना हस्तक्षेप बढ़ गया है और सबसे आश्चर्यजनक बात तो यह है कि यह किसी को अजीब या गलत भी नहीं लगता ।

2. संस्कृति का वैश्वीकरण

वैश्वीकरण का एक नकारात्मक पहलू यह देखने को मिला कि इसने संयुक्त परिवारों को तोड़ा, खराब खान पान की प्रवृत्तियों को बढ़ावा दिया, दवाओं के उपयोग को बढ़ावा मिला, पाश्चात्य पहनावों को भी बढ़ावा मिला जिसने कहीं न कहीं संस्कृति का नुकसान ही किया है । तो वहीं इसकी वजह से संस्कृति का दुनियाभर में प्रसार भी हुआ । दुनिया के कई देशों में हिंदी भाषा, भारतीय संस्कृति और खान पान धीरे धीरे प्रचलित हो रहा है ।

भारत में पहले वृद्ध अपने बच्चों और नाती पोतियों को कहानियां सुनाते थे, शाम को सभी इकट्ठा होकर विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम किया करते थे, बच्चे बड़े पारंपरिक और सांस्कृतिक खेलों में हिस्सा लेते थे लेकिन वैश्वीकरण ने सबकुछ बर्बाद कर दिया । अब सभी आधुनिक तकनीकों में व्यस्त रहते हैं और एक दूसरे से बोलने का लोगों के पास समय तक नहीं है । वैश्वीकरण ने सामूहिकता की भावना को खत्म किया और व्यक्तिगत भावना को प्रबल किया है ।

वैश्वीकरण के फायदे

वैश्वीकरण के कई फायदे हैं जिन्हें संक्षेप में समझते हैं:

  • कम कीमतों पर बेहतर उत्पाद
  • पूंजी का बढ़ा हुआ प्रवाह
  • घरेलू आय में वृद्धि
  • लोगों के जीवन स्तर में परिवर्तन
  • सीमा पार निवेश में वृद्धि
  • बुनियादी ढांचे का विकास

वैश्वीकरण के नुकसान

जहां वैश्वीकरण के कुछ फायदे हैं तो इसके कई नुकसान भी देखने को मिलते हैं । वैश्वीकरण के नुकसान इस प्रकार हैं:

  • आयात कर को समाप्त करने से राष्ट्रीय आय में कमी आई है
  • बेरोजगारी का कारण बन सकता है
  • बुनियादी मूल्यों का पतन
  • छोटे पैमाने के उद्योगों को नुकसान
  • अमीर और गरीब के बीच असमानता
  • आर्थिक शक्ति का पुनर्वितरण

वैश्वीकरण का भारत पर क्या प्रभाव पड़ा ?

वैश्वीकरण का भारत के हर क्षेत्र में प्रभाव पड़ा है और यह साफ साफ दिखलाई भी पड़ता है । चलिए एक एक करके हम समझते हैं कि इसका क्या प्रभाव पड़ा है ।

1. उपभोक्ताओं के लिए अधिक विकल्प

वैश्वीकरण ने उपभोक्ता उत्पादों के बाजार में तेजी ला दी है । हमारे पास उस समय के विपरीत सामानों का चयन करने के लिए कई विकल्प हैं जहां केवल कुछ निर्माता थे ।

2. नौकरियों की अधिक संख्या

विदेशी कंपनियों के आगमन और अर्थव्यवस्था में वृद्धि से रोजगार सृजन हुआ है । हालांकि, ये नौकरियां सेवा क्षेत्र में अधिक केंद्रित हैं और इससे सेवा क्षेत्र का तेजी से विकास हुआ है जिससे निम्न स्तर की शिक्षा वाले व्यक्तियों के लिए समस्याएं पैदा हो रही हैं । पिछला दशक अपनी बेरोजगार वृद्धि के लिए जाना जाने लगा क्योंकि रोजगार सृजन आर्थिक विकास के स्तर के अनुपात में नहीं था ।

3. कृषि क्षेत्र में विकास

भारत एक बड़े पैमाने पर कृषि प्रधान समाज हुआ करता था, जिसमें देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अपनी आजीविका के लिए इस क्षेत्र पर निर्भर था । वैश्वीकरण की वजह से किसानों की तकनीकी क्षमताओं में वृद्धि हुई है – चाय, कॉफी और चीनी जैसे भारतीय उत्पादों के वैश्विक निर्यात को चलाने में काफी मदद मिली ।

4. मुआवजे में वृद्धि

वैश्वीकरण के बाद, विदेशी कंपनी द्वारा प्रदान किए जाने वाले कौशल और ज्ञान के कारण घरेलू कंपनियों की तुलना में मुआवजे के स्तर में वृद्धि हुई है । यह अवसर प्रबंधन संरचना के परिवर्तन के रूप में भी उभरा ।

Conclusion – Vaishvikaran Kya Hai

बाजारों का विस्तार करने और उपलब्ध संसाधनों का एक समझदार उपयोग करने के लिए व्यवसाय को सक्षम करने के लिए वैश्वीकरण महत्वपूर्ण है । यह एक व्यक्ति और राष्ट्र के विभिन्न मुद्दों को भी हल करता है, जिससे उन्हें चुनने और उनकी जरूरतों को पूरा करने के लिए कई विकल्प मिलते हैं । हमें आशा है कि आपको Vaishvikaran kya hai पूरी तरह समझ आ चुका होगा ।

अगर आप चाहें तो वैश्वीकरण PDF Download करके भी पीडीएफ के माध्यम से इसके बारे में जान समझ सकते हैं । आपके इस Vaishvikaran in Hindi पर अन्य कोई भी प्रश्न हैं तो आप नीचे कमेंट करके पूछ सकते हैं । आर्टिकल हेल्पफुल लगा हो तो इसे शेयर जरूर करें ।

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